आज कुछ और कहने का मन कर रहा है। शाजापुर जिले का छोटा सा कस्बा है वह.... शायद आज भी उसी रूप में हो जैसा कि 20 साल पहले हुआ करता था...। हर कस्बे की तरह बस स्टैंड, जहां पूरे दिन कस्बाई बसों की आवाजाही और यहीं पर हर तरह की दुकानें... कुछ छोटी तो कुछ बड़ी। बस शाजापुर बेल्ट के बस स्टैंडों की पहचान जाहिर करती दो तीन रेस्टोरेंट कम होटल या होटल कम रेस्टोरेंट... चाहे जो कह लीजिए... और ठीक इसी बस स्टैंड के सामने वह सरकारी स्कूल जहां हमारी शिक्षा का एक साल गुजरा... मगर यह एक साल जैसे पूरी जिंदगी की धरोहर बन कर रह गया है...। यहां आने के पहले केवल छोटी सी उत्सुकता थी... कैसा होगा यह कस्बा, कैसा होगा स्कूल और कैसे होंगे नए सहपाठी... मगर यहां से जाने पर बस एक हलचल थी मन में... और था जिंदगी भर कसकने वाला मीठा सा दर्द...। क्या था यह... उम्र के खूबसूरत मोड़ का आकर्षण मात्र या फिर मन में लगा ऐसा बंधन जिसे आज तक नहीं खोल पाए हैं... आकर्षण था तो फिर क्यों आज जिंदगी के इस अधियारे में वही कसक बरकरार है... और बंधन था तो क्यों नहीं खुल पा रहा है.... मन क्यों नहीं आजाद हो पा रहा है.... शायद इसी को प्यार कहते हैं...
प्यार एक खूबसूरत एहसास... जो उम्र के उस खूबसूरत मोड़ पर सभी को होता है... मगर हमे इतनी शिद्दत से होगा, इसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी। बचपन का खेल खत्म हुआ तो हम उनसे लापरवाह से रहने लगे जो कभी हमारी साथी हुआ करती थीं... लापरवाही धीरे-धीरे उदासीनता में कब बदल गई हमे भी पता नहीं लगा और हम कटने लगे.... मगर वह क्या था... क्या था वह जो उस दिन हमारे मन में ऐसी उथल-पुथल मचा गया कि आज तक शांत नहीं हो पाई....
क्लास रूम का शायद पहला ही दिन था वह... या फिर दूसरा या तीसरा रहा होगा... खैर इससे क्या फर्क पड़ता है। हमारा कोई भी दिन रहा हो, मगर पक्का उसका वह पहला ही दिन था। हम अपने नए दोस्तों के साथ मजाक-मस्ती में लगे थे कि अचानक दरवाजे पर वह प्रकट हुई। हमारे लिए तो वह प्रकट ही हुई थी, क्योंकि इसके पहले हमारा ध्यान ही उधर नहीं था... एक बार जब ध्यान गया तो चाहकर भी हटा न सके हम। वहीं अटककर रहा गया हमारा ध्यान भी और मन भी... अब इस मन का क्या करें कि बार-बार हमे उसकी तरफ नजर घुमाने के लिए विवश कर रहा था और हमारी नजरें भी रह-रहकर उस चेहरे पर जम जा रहीं थीं। हमारी क्लास में कुल मिलाकर सात-आठ स्टुडेंट्स ही थे और सभी क्लास टीचर की टेबल पर घेर कर बैठते थे। वह सीधे हमारे सामने आकर बैठ गई और हमारे मन में एक अजीब सी हलचल मचाती चली गई...। यह हलचल आज भी वैसी ही है, जैसी की उस पहले दिन थी...। खैर आज के लिए इतना ही कल फिर मिलेंगे...।
achcha likhate ho bhai
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